कार्बन-डाई-आक्साइड नियंत्रक मशीन (डायरेक्ट एयर कैप्चर सिस्टम)

 नमस्कार दोस्तों,
 देश का दिल दिल्ली कुछ दिनों से काला नजर आ रहा है। आज दिल्ली में लगातार स्माग के कारण परेशानियाँ बढ़ रही हैं, साल दर साल दिल्ली में प्रदूषण का स्तर और भी भयानक रूप लेता जा रहा है। यदि हम इंसानों ने प्रदूषण के बढ़ते स्तर को गंभीरता से नहीं लिया तो जो स्थिति आज दिल्ली में है वह पूरे विश्व में हो सकती है।

प्रदूषण को रोकने के लिए बहुत से तरीके होते हैं, कुछ प्राकृतिक और कुछ वैज्ञानिक। आज हम बात करेंगे एक एेसी तकनीक की जो वैज्ञानिकों के द्वारा खोजी गई है जो कि भविष्य में प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए उपयोगी साबित हो सकती है।

      स्विट्जरलैंड की एक कंपनी ने एक ऐसी मशीन का अविष्कार किया है जिससे हम अपने आसपास के वातावरण की कार्बन-डाई-आक्साइड को नियंत्रित कर सकते हैं। यह मशीन डायरेक्ट एयर कैप्चर सिस्टम के आधार पर कार्य करती है, इस मशीन का आकार लगभग एक छोटे मकान जितना है जिसमें 18 पंखे लगे हुए हैं और ये पंखे सामान्य हवा को खींचने का काम करते हैं। इसके बाद मशीन के अंदर एक फिल्टर लगा हुआ है जिसमें रासायनिक तत्वों की परत चढ़ी है जो कि सामान्य हवा से केवल कार्बन-डाई-आक्साइड को सोखती है सोखी गई कार्बन-डाई-आक्साइड को एक चेंबर में इकट्ठा कर लेती है, और बची हुई हवा को बाहर निकाल देती है।

अब आपके दिमाग में ये सवाल आ रहा होगा कि जो कार्बन-डाई-आक्साइड मशीन के द्वारा इक्ट्ठी की गई है उसका क्या उपयोग है?
जो इक्ट्ठी की गई कार्बन-डाई-आक्साइड है उसे रसायन बनाने वाली कंपनियों को बेच दिया जाता है जिससे उस कार्बन-डाई-आक्साइड का उपयोग कर नये रसायनिक पदार्थ बनाये जाते हैं जैसे कि रासायनिक खाद, रसायनिक हथियार, अाग बुझाने वाले उपकरण।

       इन सबके अलावा ग्रीन हाउस या पालीहाउस में भी कार्बन-डाई-आक्साइड का इस्तेमाल किया जा सकता है जो कि हमने वातावरण से इकट्ठी की है।

इस मशीन के द्वारा साल भर में लगभग 900 टन कार्बन-डाई-आक्साइड प्राप्त की जा सकती है। जानकारों की मानें तो पूरे विश्व में कार्बन-डाई-आक्साइड के बढ़ते स्तर का नियंत्रण करने के लिए लगभग 75 लाख मशीनें लगाने की जरूरत होगी। जो काफी महंगा और कठिन काम है। हालाँकि वैज्ञानिकों का दावा है कि इस तकनीक को भविष्य में और अधिक सरल और सस्ती बनाया जा सकता है।

कार्बन-डाई-आक्साइड को इकट्ठा करने की इस तकनीक की एक और बड़ी समस्या यह भी है कि इस तकनीक में बहुत अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है, जो कार्बन-डाई-आक्साइड को कम करने का महंगा सौदा है।

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